Thursday 23 May 2024 8:31 AM
Aman Patrika
बिहार/ब्रेकिंग न्यूज

अपराधी और माफिया, नेताओं के नाजायज औलाद हैं। नेता, अपराधियों को दामाद की तरह पलते हैं और अपने फायदे के हिसाब से राजनीतिक बयान बाजी करते हैं। चुनाव आने वाला है और नेताओं को बिहार में अपराध की घटनाएं दिखने लगी हैं। जबकि हकीकत ये है कि यहाँ हत्या रोज हो रही है। अपराधियों का मनोबल सातवें आसमान पर है।

अपराधी और माफिया, नेताओं के नाजायज औलाद हैं। नेता, अपराधियों को दामाद की तरह पलते हैं और अपने फायदे के हिसाब से राजनीतिक बयान बाजी करते हैं। चुनाव आने वाला है और नेताओं को बिहार में अपराध की घटनाएं दिखने लगी हैं। जबकि हकीकत ये है कि यहाँ हत्या रोज हो रही है। अपराधियों का मनोबल सातवें आसमान पर है।

अपराधी और माफिया, नेताओं के नाजायज औलाद हैं। नेता, अपराधियों को दामाद की तरह पलते हैं और अपने फायदे के हिसाब से राजनीतिक बयान बाजी करते हैं। चुनाव आने वाला है और नेताओं को बिहार में अपराध की घटनाएं दिखने लगी हैं। जबकि हकीकत ये है कि यहाँ हत्या रोज हो रही है। अपराधियों का मनोबल सातवें आसमान पर है। आप मेरे सारे फेसबुक पोस्ट को देख लीजिए। हर जगह लाश उठा – उठा कर लड़ाई लड़ता रहा हूं। उन्हें न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करता हूं। बिहार के हर हिस्से में जाता हूं। लेकिन तब ना तो सरकार को फर्क पड़ता है और ना राजनीति करने वाले नेताओं को। आप ही एक अकेला आदमी बिना किसी संसाधन के कितना करे ?

सभी नेताओं ने अपने दलों में हर तरह के माफियाओं को संरक्षण दे कर रखा है। कोई दूध का धुला नहीं है। नेता तो नेता समाज भी अपराधियों का वंदन करता है। पत्रकार राजदेव से लेकर पत्रकार विमल यादव तक किसी को न्याय नहीं मिला। शाही, समीर, रितेश ऐसे कई हाई प्रोफाइल मामलों में आज तक न्याय जैसा कुछ नहीं हुआ। हाजीपुर, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, कोसी, सीमांचल, मगध, छपरा, आरा मैं कहां-कहां का नाम लूं। हर जगह अपराधियों ने लोगों की जिंदगी छीन ली, लेकिन सजा कितनों को मिली। जरा इस पर गौर कर लीजिए।

वही हाल प्रदेश में महिलाओं का है। मानव व्यापार से लेकर देह व्यापार तक का सिंडिकेट प्रदेश में चल रहा है, जहां बहू बेटियों को नर्क में धकेल दिया जाता है। लेकिन अपने दिमाग पर जोर डालकर सोचिए कि क्या इससे समाज, सरकार और सिस्टम को कोई फर्क पड़ता है? घटनाएं होती हैं। खबर देख सुन ली जाती हैं। सरकार से हमदर्दी है तो इसके लिए तर्क कर दिए जाते हैं। सरकार के विपक्ष में तो दोषारोपण की राजनीति होती है। फिर सब भूल जाते हैं। आखिर क्यों?

आखिर अपराधियों को सजा क्यों नहीं होती? पुलिस प्रशासन की भूमिका अपराधियों को सजा दिलाने में क्या होनी चाहिए? ऐसा नहीं है कि सिर्फ एक ही सरकार में हत्याओं का दौर चलता है। लेकिन नेता तो नेता ठहरे। उनके बच्चे विदेश में पढ़ते हैं। पुलिस की सुरक्षा मिलती है। रह जाते हैं आम आदमी। इनके लिए कौन सोचता है भला? हर बार महंगे चुनाव होते हैं। सुरक्षा के वादे होते हैं। न्याय के राज की बात होती है। मगर होता क्या है ? वास्तविकता क्या है?

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