Monday 20 May 2024 1:39 AM
Aman Patrika
बिहार/ब्रेकिंग न्यूज

कानून की तरह माने आदेश धूप छांव से भरा सीनियर्स का जीवन ******************आज सीनियर सिटीजन डे होने के नाते मेरा फर्ज बनता है, झुंझुनू जिले के सर्व समाज के लोगो को जो सीनियर है। उनको मेरे मन में जो विचार है

कानून की तरह माने आदेश धूप छांव से भरा सीनियर्स का जीवन ******************आज सीनियर सिटीजन डे होने के नाते मेरा फर्ज बनता है, झुंझुनू जिले के सर्व समाज के लोगो को जो सीनियर है। उनको मेरे मन में जो विचार है वह उनके आगे पेश करु। साथियों आधुनिक जीवन शैली पीढीयो की विचारों में भिन्नता आदि के कारण आजकल की युवा पीढ़ी कर्तव्य हीन हो गई है ।.जिसका खामियाजा सीनीयर लोगों कोभुगतना पड़ता है.।

कानून की तरह माने आदेश
धूप छांव से भरा सीनियर्स का जीवन
******************आज सीनियर सिटीजन डे होने के नाते मेरा फर्ज बनता है, झुंझुनू जिले के सर्व समाज के लोगो को जो सीनियर है। उनको
मेरे मन में जो विचार है वह उनके आगे पेश करु।
साथियों
आधुनिक जीवन शैली पीढीयो की विचारों में भिन्नता आदि के कारण आजकल की युवा पीढ़ी कर्तव्य हीन हो गई है ।.जिसका खामियाजा सीनीयर लोगों कोभुगतना पड़ता है.। जबकि उनका जीवन अनुभव से भरा पड़ा होता है, उन्होंने जीवन में कई धूप छांव देखे होते हैं.। हमें उनके अनुभवों को जीवन में अपनाना चाहिए ।.आज भी कई परिवारों के संस्कारी लोग अपने बड़े बुजुर्गों के आदेशों को एक कानून की तरह मानते हैं ।.बुजुर्गों द्वारा दी गई प्रेरणा जीवन में नए बदलाव का एक मुख्य स्रोत बनती है .जो बच्चा आज अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर उनसे संस्कार ग्रहण करता है ।.वह जीवन में कभी भी असफल नहीं होता है।.हमें अपने व्यस्त समय में से थोड़ा सा समय निकाल कर बुजुर्गों की सेवा में लगाना चाहिए और उनकी सीख पर ध्यान देते हुए उनके द्वारा दिए हुए संस्कारों को अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।

मां बाप पेड़ की तरह होते हैं जो अपनी पूरी जिंदगी हमारी खुशी के लिए जीते हैं ।
आज वह बुड्ढे हो गए तो क्या हुआ।छांव तो आज भी उनकी ही ठंडी होती है।

फर्ज निभाएं पल्ला ना झाडे

कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने सभी सीमित साधन बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में लगा दिए और अपने भविष्य के लिए कुछ नहीं बचा पाए. यह सोच कर कि बच्चे अगर अच्छी नौकरी और व्यापार में लग गए तो उन्हें बुढ़ापे में कोई चिंता नहीं होगी ,लेकिन बच्चे सामर्थ होने पर भी अपने भी.माता-पिता को भूल जाए .यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले, कि उन्होने जो किया है वह उनका फर्ज था, तो उन माता-पिता के दर्द को आप आसानी से समझ सकते हैं। .यह सही है कि कानून बच्चों को माता-पिता की आर्थिक सहायता के लिए बाध्य कर सकता है .लेकिन वे ऐसा नहीं करते है।

जानीये
दादा _दादी नाना-नानी की कहानियों में साहस

आज की वयस्त दौर में हम अपने बुजुर्गों की सलाह लेना भूल गए हैं l
पहले दादा नानी की कहानियों में साहस के साथ संदेश भी होता था, उन कहानियों का उद्देश्य बच्चों को मात्र खुश करना नहीं था बल्कि हमें भविष्य संस्कार तथा रीति रिवाज प्रेम और आदर भाव की ओर अग्रसर करना था। .आज की पीढ़ी भले ही इंटरनेट के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने में विश्वास रखती है ।.लेकिन बड़ी-बड़ी नेटवर्किंग, साइट्स भी बच्चों को भावनात्मक. सामाजिक एवं आपसी भाईचारे का ज्ञान नहीं दे सकती ।.जो समय समय पर बुजुर्ग अपने प्यार और दुलार की बौछार के साथ देते रहते हैं।

मैं सभी बुजुर्गों को नमस्कार वह अभिनंदन करता हूं और कुछ बातें बुजुर्गों को भी बताना चाहता हूं।
बुढ़ापा ऐसी चीज है जो अपने आप आ जाता है कोई बुलाता नहीं है ।बुढ़ापे को हम उसे देख धकेलते जरूर है यदि 60 वर्ष के हैं तो 50 बरस के दिखने की कोशिश करते हैं।
इसलिए मेरा तो यही मानना है जी आगमन अनिवार्य है उससे मुंह फेरना उचित नहीं है ।आपके घर पर कोई अतिथि आता है तो आप अपने अतिथि देवो _भव की पर परंपरा के अनुसार उसका स्वागत करते है।
इसलिए
बुढ़ापा भी आपका अतिथि है, इससे घबराइए नहीं
सवाल ये उठता है ।इस का भव्य स्वागत हम कैसे करें। यदि हम ढंग से जीना सीख जाए तो बुढ़ापा अमृत बन सकता है।
कैसे
क्योंकि बुढ़ापा जीवन का शिखर है ,जीवन की सर्वोच्च अवस्था है ,घर के हर सदस्य को रोज अपना कुछ समय अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर गुजरना चाहिए और उनसे शिक्षा लेनी चाहिए ।आज के भटकते युवाओं को सही रास्ता बुर्जग यानी सीनियर सिटीजन ही दिखा सकते हैं।
सीनियर सिटीजन पारिवारिक धरोहर है ,उन्हें सुरक्षित करने की जरूरत है ,बल्कि उन्हें परिवार में रखकर उनके आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए उनकी सेवा की जरूरत है। आज बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम बनाने की जरूरत नहीं है।पुराने जमाने में १०_१० संताने होती थी जिनका लालन-पालन मां-बाप ही किया करते थे। आज दो तीन संताने होकर एक बुड्ढे मां-बाप का ध्यान नहीं रखती, बड़े अफसोस की बात है।
जीवन दाता पिता के लिए घर के अंदर कोई स्थान ना होना बेहद दुख की बात है वृद्धाश्रम की आवश्यकता हमारे समाज में क्रेशर के समान है ।बुजुर्गों को घर के कोने में नहीं अपने दिल में जगह दो ताकि खुशियां खुद चलकर आपके पास आए।
आज घर में कुत्ते रहने के लिए स्वतंत्र भोजन व निवास की व्यवस्था है ,लेकिन जन्म देने वाले मां बाप को वृद्ध आश्रम में भेजा जाता है यह अच्छी बात नहीं ।
दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखें मां बाप अपने बच्चों पर बोझ हो सकते हैं परंतु मां-बाप ने अपने बच्चों को कभी बोझ नहीं माना।

विशिष्ट जन ओल्ड इज गोल्ड।
गोल्ड इस नेवर ओल्ड।

युवाओं को अपने जीवन में सफल रहे लोगों की जिंदगी से कुछ सीखना चाहिए। क्योंकि उनके अनुभव और सफलता का सूत्र हमेशा उपलब्ध हो सकते हैं जबकि यही चीज हासिल करने के लिए हमें बहुत ठोकरे खानी पड़ती है ।कई कसौटीइयों से गुजरना पड़ता है ।इसलिए अब मैं ज्यादा समय नहीं लेकर यही कहना चाहूंगा। महान लोगों द्वारा अर्जित अनुभव और सिद्धांतों से सीख कर हम सफलता बिना असफलता से जल्दी हासिल कर सकते हैं आज की पीढ़ी भले इंटरनेट के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने में विश्वास रखती है ,लेकिन बड़ी-बड़ी नेटवर्किंग साइंटिस्ट भी बच्चों को भावनातमक सामाजिक आपसी भाईचारे का ज्ञान नहीं दे सकती ,जो समय-समय पर बुजुर्ग अपने प्यार और दुलार की बौछार के साथ देते रहते हैं।धन्यवाद

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