Saturday 25 May 2024 11:18 PM
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अवसर की ताक में लोकतंत्र के बहुरूपिए जो देश का अहित कर रहे हैं।

अवसर की ताक में लोकतंत्र के बहुरूपिए जो देश का अहित कर रहे हैं।

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अवसर की ताक में लोकतंत्र के बहुरूपिए
जो देश का अहित कर रहे हैं।

लेखक – चंद्रकांत पूजारी
गुजरात

अवसर हर एक व्यक्ति को जीने की दशा और दिशा देता है।अवसर यदि अच्छे लोगों को मिलता है तो माहौल अच्छा और सच्चा हो जाता है और अवसर बुरे व्यक्ति को मिले तो निश्चित ही माहौल बुरा हो जाता है। हमारे देश में लोकतंत्र है सारी पार्टियां अवसर की तलाश में रहती है कि, उन्हें सत्ता में आने का मौका मिले तो वह देश के लिए कुछ करे?
हमारे देश में लोगों को यह मौका तो मिलता है परंतु व्यक्तिगत आधार पर नहीं बल्कि पार्टी के आधार पर ? पार्टी में अच्छे और बुरे लोग दोनों होते हैं और अवसर अच्छे और बुरे दोनों लोगों को मिल जाता है। अच्छे लोग सच्चाई और अच्छाई की मर्यादा में दबे रह जाते हैं और बुरे लोग देश का बुरा कर जाते हैं। जबकि लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, स्पष्टता, स्वच्छता एवं जवाबदेही आवश्यक है,इन सब से भी पहले व्यक्ति में राष्ट्रीयता की भावना की प्रचुरता आवश्यक है। लोकतंत्र लोकशासन है और लोगो में राष्ट्रीयता की भावना सबसे पहले होना आवश्यक है परंतु हमारे देश के लोकतंत्र में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव देखा जा सकता है? राष्ट्रीयता की भावना की जगह व्यक्तिगत भावना का असर हर राज्य की शासन-व्यवस्था एवं जनप्रतिनिधियों में देखा जा सकता है।
यह भावना आज़ादी से पहले ही बीज के रुप में बोई गई है जो अब फल-फूल रही है।देश को आजादी बंटवारे की कीमत पर मिली क्षेत्र के साथ साथ धार्मिक भावनाओं के बंटवारे पर आजादी मिली? और यह बंटवारा देश का दुर्भाग्य बन गई?देश तो बट गया किन्तु धर्म के बंटवारे की भावना हमारे देश में आज भी फल फूल रही है। आज़ादी के समय जो बीज बोया गया वह आज कांटेदार वृक्ष बन चुका है?
आज़ादी के बाद देश में दो राजनीतिक दल मुख्य रुप से देश के शासन में भागीदार रही है पहला कांग्रेस और दूसरा भारतीय जनता पार्टी।इन दोनों पार्टियों के अलावा बहुत सारी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो इन दोनों पार्टियों को मजबूत बनाने में सहायक रही है एवं दल-बदल के तहत देश को हानि पहुंचा रही है विधायको की खरीद बिक्री और पार्टियों की खरीद बिक्री को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है और सबसे ज्यादा देश को कमजोर कर रही है।
बंटवारे के तर्ज पर देश की दोनों मुख्य पार्टियां भी बंटी रही एक ने मुस्लिम अल्पसंख्यको को खुश कर राजनीति की और दूसरे ने हिन्दू और सनातन धर्म का सहारा लेकर राजनीति कर रही है इसमें कहीं से कोई दो राय नहीं है?
यही कारण है कि अबतक कभी भी देश में किसी भी योजना या देश के विकास से संबंधित किसी कार्य में आम सहमति नहीं बन पाई है।इन दोनों पार्टियों की सोच एवं नीति देश को दो अलग-अलग दिशाओं में ले जाती रही है जो देश के लिए उस समय भी घातक था जब देश का बंटवारा हुआ और अभी भी घातक है जब देश दंगों की बारूद पर बैठ चुका है?
इन दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने देश में राष्ट्रीयता की भावना को लेकर शासन नहीं किया है वरण धर्म का सहारा लेकर देश तथा देश के लोगों को गुमराह किया है।
जबकि होना यह चाहिए था कि देश में धर्म से हटकर देश के विकास और देश की सुरक्षा को ध्यान में रखकर राष्ट्रवाद का हाथ पकड़ कर शासन होना चाहिए था।
देश के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी धर्म को धर्म की जगह होना चाहिए था, राजनीति का हिस्सा धर्म को नहीं बनाना चाहिए था,अगर ऐसा हुआ होता तो निश्चित ही आज देश की तस्वीर ही अलग होती ।
आज निश्चित ही देश पूरी दुनिया के सामने मजबूत स्थिति में है परंतु धर्म को हथियार बनाकर राजनीति करना देश के हित में बिल्कुल भी नहीं है।
लोकतंत्र में अवसर वैसे लोगो को मिलना चाहिए जो वास्तव में राष्ट्रवादी हो और देश का विकास करना चाहते हैं।

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